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Friday, 26 June 2026

Crossroads of Parenting

कई बार मैंने सोचा -Why we are not getting along with our kids so well ?

कुछ मथा ,कुछ सोचा और कुछ समझा तो पाया -हर उम्र की एक पसंद-नापसंद होती है और सोचने-समझने का एक तरीका होता है तो जब दो अलग अलग उम्र के लोग साथ बैठ कर बात करने बैठते हैं तो बहुत ज़्यादा संभावना है कि उनके बीच कुछ ही देर में वाद विवाद शुरू हो जाये ।

इसका कतई ये मतलब नहीं है कि उन दो पीढ़ियों के बीच मनभेद है .ये पूरी तरह से मतभेद (difference of opinion) है और  इसके लिए किसी भी पीढ़ी को अपराधबोध(guilt) में आने की जरूरत नहीं हैं।

याद कीजिए कि जो चीज़ें/बातें जब आप उनकी उम्र के थे तो आपको भी पसंद थी जो आज आपके बच्चों को आकर्षित करती है लेकिन अब वही सब आपको फ़िज़ूल और बेकार लगता/लगती हैं ।उस समय आपके बड़ों को भी वो फ़ज़ूल/बेकार/समय बर्बाद करने वाली लगती थीं और तब भी आप लोगों के बीच वैचारिक मतभेद हुआ करते थे।

हममें से जो भी माता पिता यहाँ मुझे समझाना चाहेंगे और बताना चाहेंगे कि वो ऐसे नहीं थे या आज की पीढ़ी से ज़्यादा अनुशासित थे तो शायद मैं पूरे मन से आप की बात नहीं मान पाऊँ क्योंकि ऐसे बच्चों का प्रतिशत तब भी कम था और आज भी कम ही है।प्रतिशत हमेशा दो अंकों में उन बच्चों का रहा है जो बच्चे ही रहे हैं अपने बचपन में,अगर उनकी पारिवारिक परिस्थितियाँ अनुकूल(favorable) रही होंगी तो। 

सवाल ये है कि :

ये मतभेद दूर हो सकते हैं? हाँ या ना?

अगर हाँ तो कैसे?

अगर ना तो क्यों नहीं?

मेरे मत से जवाब है -हाँ  

कैसे?-

संभव है अगर हम उनके स्तर (level) को समझ पाये या वो हमारे स्तर पर आ कर चीज़ें देख पाएँ ,समझ पायें और मान पायें ।

आपको क्या लगता है दोनों में से कौन सी संभावना व्यावहारिक(practical) है?

मेरे हिसाब से तो पहला वाला ज़्यादा व्यावहारिक लग रहा है तो कष्ट हमारी पीढ़ी को ही उठाना पड़ेगा कुछ झुक कर,समझ कर उनके स्तर को हमें ही समझना होगा-उनको समझाने के लिए ।उनकी ही भाषा ,उनके ही विचारों को काम में लेना होगा और वो भी इस तरह कि उन्हें ये सीख/बोझ ना लगें । इसके लिए पहली जरूरत है कि आप ध्यान दें कि इस पीढ़ी में क्या चल रहा है वो भी स्वयं के परीक्षण से नाकि किसी और के अनुभवों के आधार पर ।

तो सही मायनों में जो भी अनुभव जैसे सहनशीलता, संचार कौशल-स्पष्ट, सही और प्रभावी ढंग से बात कहने की कला इत्यादि हमने जो अब तक कमायें हैं उनको प्रयोग में लाने का ईश्वर ने समय तय किया है हमारे बच्चों के रूप में ।

बच्चो से हम अपेक्षा नहीं रख सकते कि वो अपने भविष्य की समझदारी को कम उम्र में ही ले आयें ।

तो चलिए उन बातों का जिनका हमेंध्यान रखना है जैसे:

1. बच्चों से बात करते वक़्त हमें अपनी बात उनपर थोपने का प्रयास नहीं करना चाहिए ,जब हम तर्क प्रयोग उदाहरणों से अपनी बात उनके सामने रखेंगे,तो वो ज़्यादा सुनेंगे (receptive)

2.हम अपने अनुभव उनसे साझा करेंगे पर उनसे अपेक्षा नहीं करेंगे कि वो उनसे प्रेरित होंगे हम पर गर्व करें और उनके अनुसार ही चलेंगे

3.हम उन्हें भावी कठिनाइयों से अवगत करायेंगे ,कोशिश करेंगे की वो बुरे अनुभवों से बच जाएँ पर बचा ही पाएंगे ऐसी आशा हम नहीं रखेंगे यहाँ गीता का संदेश याद रखना है कि कर्म करना है पर इच्छानुसार फल मिले ऐसी मंशा नहीं रखनी है ।


4.उनकी की हुई गलतियों पर उन्हें उनके बारे में कोई पक्की राय नहीं बनायेंगे आज की भाषा में इसे judge करना कहते हैं ।


5.एक पैरेंट के रूप में मैंने, “ साक्षी भाव” का काफ़ी अभ्यास किया है और इसने मुझे अनावश्यक विवाद/बहस से कई बार बचाया है ।


6.बच्चों को अभिव्यक्ति की /बोलने की स्वतंत्रता(freedom of speech)देनी है पर इतनी भी नहीं आप की छीन जाये,एक महीन सी रेखा है इन दो के बीच ।


7.उन्हें आप अपना ऐसा व्यवहार दें जिसमें वो हर तरह की बात आप से साझा कर पायें बिना इस डर के कि आप उन्हें समझ नहीं पाएंगे या बिना पूरा सुने उन्हें अस्वीकार(turn down)) कर देंगे ।


8.पैरेंटिंग में एक बात छोड़ना पेरेंट्स के लिए काफ़ी मुश्किल होता है और वो है, “ The Art  of Unlearning”,आप पूछेंगे कि ये क्या है?

ये है अपनी सीखी हुई चीज़ों को ही सही मानना बिना वर्तमान की कसौटी पर परखे हुए और अगर आपको लगता भी है कि वो सही नहीं हैं तब भी उनको पकड़े रखना ज़िद में ।

 माता पिता बनने के साथ ही हम इस गर्व में रहते हैं हम उनसे अहर चीज़े उनसे बेहतर जानते हैं क्योंकि हा,अरे पास अनुभवों का पिटारा है,उम्र का तय किए हुआ एक लंबा सफ़र है और हम जो कर रहें हैं या कह रहे हैं वो हो अंतिम सत्य है (जो कि वास्तविकता नहीं है) क्योंकि जनाब जब तक हम इस धरती पर हैं तब तक हम प्रशिक्षु ही हैं क्योंकि ताउम्र आप सीखते ही रहते हो । आप अपने बच्चों से ज़्यादा जानते हो ये हो सकता है पर आप ही जानते हो या आप ही सही हो ये असंभव है,तो इस मुग़ालते से बचके रहना अत्यधिक आवश्यक है दो पीढ़ियों ले सामंजस्य को बनाये रखने के लिए ।

जो भी चीज़े नए संदर्भ या नई परिस्थितियों के अनुकूल ना हों उन्हें छोड़ देना ही maturity है उन सीखी हुई बात को भुला देना(Unlearn) ही समझदारी है,पकड़े रहना एक ज़िद हो सकती है पर परिपक्वता नहीं ।

9.एक और बात मैंने अनुभव की है कि हम अपने पास्ट/भूतकाल को काफ़ी महिमामंडित (Glorify) करके अपने बच्चों से साझा करते हैं और भूल जाते हैं हर आने वाली पीढ़ी तर्क में पुरानी पीढ़ी से दो कदम आगे ही होती है तो जब हम अपने किस्से साझा करें तो उनकी वयावहारिकता की कसौटी में कस के ही उन्हें बताए सीधे ही रामायण काल के श्रीराम/सीता  के रूप में ख़ुद को पेश ना करें क्योंकि आप के साथ रहते हुए वो भी आपको अब्ज़र्व कर रहे होतें हैं/आपके व्यवहार से/आदतों से बाकायदा वाक़िफ़ ही रहते हैं बस उम्र और रिश्ते की मर्यादा के चलते आप से वाद विवाद नहीं करते पर अगर आप बार बार उन्हें उकसाएँगे तो सब्र का बांध आपकी ही तरह उनका भी टूट सकता है ।

So ,Beware they are aware  


10. हो सके तो अपने बच्चों को समय दें,उन्हें समझने की कोशिश करें और कुछ नहीं तो चुपचाप उनको देखें ।उन्हें चैलेंज लेना सिखायें ,उन्हें जीतना सिखायें पर हार को स्वीकार करना भी सिखायें ।

स्वयं भी धीरज रखें और अपने रोज़मर्रा के उदाहरणों से उन्हें भी धीरज सिखायें क्योंकि आपका बच्चा आपको रोज़ देख कर ही अपनी आदतें बना रहा है वो आपके कहे हुए शब्दों से प्रभावित नहीं होता पर कम उम्र तक आपके काम करने के तरीक़ों को देखता है और सीखता है ।

जब वो स्वयं अपनी समझ विकसित कर लेता है तब आपकी कमियों को भी देखता है या बताता है उस समय आपको ये कहते हुए स्वीकार करना चाहिए कि आप भी एक प्रशिक्षु ही हैं और भगवान नहीं है तो कमियाँ/ ग़लतियाँ होना स्वाभाविक है ।💛

 (To err is the human)


11.अंत में सिर्फ़ इतना ही कहना चाहूँगी कि आप अपने आप को हर हाल में एक सफल मातपिता ही मानें क्योंकि बिना किसी प्रशिक्षण के  आपने ये फ़र्ज़ अच्छे से निभाया है जो कुछ भी सीखा है, आपने अपने पैरेंट्स से ही सीखा है जो ख़ुद भी अप्रशिक्षित ही थे  ।

इस यात्रा में हम एक दूसरे के अनुभवों से सीखेंगे और एक दूसरे को साझा भी करेंगे ।

अंत में एक सच्चाई (Honest admission) और 😃कहना चाहूँगी कि भले ही हम कितनी भी कोशिश कर लें एक समझदार(understanding ) पेरेंट्स बनने की -हमारे अंदर का मूल भारतीय पैरेंट दिन में एक दो बार तो बाहर आ ही जाता है  उसे पकड़ के रखना ही हमारे लिए मूल चुनौती है ।


Happy Parenting 

Seema 


Wednesday, 15 April 2026

Non verbal cues

Many of us remain unaware about the importance of non verbal cues of a person.We just concentrates on what's being said by a person. We keep on entangled among tone, word selection, dialect chosen to communicate and sometimes spelling mistakes if its a presentation.


Don't you think that we should be able to read in between the lines.We need to master the art of pure observation, that too with three dimensional or 360 degree view.This art needs good exposure of the communication with different types of the people initially and then to good co relational practices to master the art of understanding non verbal cues(things which are not said but still imparted during the communication).

A person may appear ostensibly polite but our antenna should be able to catch the satire/taunt/ hidden intentions behind the politeness of words.It requires strong senses, bouquet of experiences and silent observational vision.

One can always wrap his/her feelings in a beautiful bouquet of words to offer but he/she can't hide the the intentions or real feelings because its bound to brim over by non verbal cues of the body imparted while he/she is busy in speaking.

IF you want to appear stable and composed during a talk ,take care of not only to your words and tone but also about your body language so that all these go hand in hand in very same direction and people are not confused about your words and actions-A prerequisite for better communication and comprehension.


Seema 

Wednesday, 14 January 2026

 Human brain has become too much complicated due to less physical work and more leisure time to spend on social media that too algorithm driven.

Your media feeds are reinforcing your thought process irrespective of their quality and you are stuck in a vicious loop ,unable to think or come out of that trap.You are unaware but you are weakened with these loops and your thinking process is sabotaged .